आज एक बार मैं विख्यात हिन्दी कवि स्वर्गीय बलबीर सिंह रंग जी का एक गीत शेयर कर रहा हूँ|
इनकी बहुत सी रचनाएं मैंने पहले भी शेयर की हैं|
आज प्रस्तुत है स्वर्गीय बलबीर सिंह रंग जी का यह गीत-

पराये मन की कौन सुने?
अपनी पीर सभी को प्यारी,
पीर पराई क्या बेचारी;
मुक्ति-मंत्र जग को रुचिकर,
बंधन की कौन सुने?
पराये मन की…
लख कर मधु-ऋतु का नव-यौवन,
मचला करता सतत् समीरण;
मधुबन की मलयज सुनता,
निर्जन की कौन सुने?
पराये मन की…
कवि सबकी पीड़ा पहचाने,
कवि की पीड़ा कोई न जाने;
मिलन कथा सब सुने,
विथा बिछुड़न की कौन सुने?
पराये मन की…
(आभार- एक बात मैं और बताना चाहूँगा कि अपनी ब्लॉग पोस्ट्स में मैं जो कविताएं, ग़ज़लें, शेर आदि शेयर करता हूँ उनको मैं सामान्यतः ऑनलाइन उपलब्ध ‘कविता कोश’ अथवा ‘Rekhta’ से लेता हूँ|)
आज के लिए इतना ही,
नमस्कार|
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