दिल्लियाँ!

आज एक बार मैं विख्यात हिन्दी कवि स्वर्गीय शलभ श्रीराम सिंह जी की एक कविता शेयर कर रहा हूँ|

 इनकी बहुत सी रचनाएं मैंने पहले भी शेयर की हैं|

आज प्रस्तुत है स्वर्गीय शलभ श्रीराम सिंह जी की यह कविता- 

 

हाथी की नंगी पीठ पर
घुमाया गया दाराशिकोह को गली-गली
और दिल्ली चुप रही

लोहू की नदी में खड़ा
मुस्कुराता रहा नादिर शाह
और दिल्ली चुप रही
लाल किले के सामने
बन्दा बैरागी के मुँह में डाला गया
ताज़ा लहू से लबरेज़ अपने बेटे का कलेजा
और दिल्ली चुप रही


गिरफ़्तार कर लिया गया
बहादुरशाह जफ़र को
और दिल्ली चुप रही
दफ़ा हो गए मीर गालिब
और दिल्ली चुप रही

दिल्लियाँ
चुप रहने के लिए ही होती हैं हमेशा
उनके एकान्त में
कहीं कोई नहीं होता
कुछ भी नहीं होता कभी भी शायद


(आभार- एक बात मैं और बताना चाहूँगा कि अपनी ब्लॉग पोस्ट्स में मैं जो कविताएं, ग़ज़लें, शेर आदि शेयर करता हूँ उनको मैं सामान्यतः ऑनलाइन उपलब्ध ‘कविता कोश’ अथवा ‘Rekhta’ से लेता हूँ|)

आज के लिए इतना ही,
नमस्कार|

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2 responses to “दिल्लियाँ!”

  1. नमस्कार 🙏🏻

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    1. नमस्कार जी

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