आज एक बार मैं प्रसिद्ध आधुनिक हिन्दी व्यंग्य कवि श्री अशोक वाजपेयी जी की एक कविता शेयर कर रहा हूँ|
वाजपेयी जी की बहुत सी रचनाएं मैंने पहले भी शेयर की हैं|
आज प्रस्तुत है श्री अशोक वाजपेयी जी की यह कविता-

एक दिन और
गाँठ के आगे का,
खुला हुआ
कोमलता में एक और पंखुरी
उज्ज्वलता में एक और क्षण,
परिपक्वता में एक और भराव-
एक दिन और
फिर उसका,
उसी का
जैसे दिन की शिला पर
उत्कीर्ण हो
सिर्फ़ उसका हरा-भरा नाम
घास से।
(आभार- एक बात मैं और बताना चाहूँगा कि अपनी ब्लॉग पोस्ट्स में मैं जो कविताएं, ग़ज़लें, शेर आदि शेयर करता हूँ उनको मैं सामान्यतः ऑनलाइन उपलब्ध ‘कविता कोश’ अथवा ‘Rekhta’ से लेता हूँ|)
आज के लिए इतना ही,
नमस्कार|
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