आज एक बार मैंहिन्दी श्रेष्ठ नवगीतकार स्वर्गीय रमेश रंजक जी का एक नवगीत शेयर कर रहा हूँ| यह नवगीत गीत की नई और पुरानी पीढ़ियों के अंतरसंबंधों को लेकर कहा जा सकता है|
रंजक जी की बहुत सी रचनाएं मैंने पहले भी शेयर की हैं|
आज प्रस्तुत है स्वर्गीय रमेश रंजक जी का यह नवगीत-

गूँथ खुली वेणी में
हँसी किरण-फूल की
हमने क्या भूल की ?
भौंहें क्यों तन गईं बबूल की !
बनवासी शब्दों को
नागरिक बना कर
रेखाएँ खींची अपवाद की,
नए-नए अर्थों की
वंश-बेल पा कर
काँप गई धरती अनुवाद की
सामंती छंद-छाँह छोड़ कर
एक अदद गुणा, भाग जोड़ कर
अनब्याही रोशनी कबूल की
हमने क्या भूल की
भौंहें क्यों तन गईं बबूल की ?
(आभार- एक बात मैं और बताना चाहूँगा कि अपनी ब्लॉग पोस्ट्स में मैं जो कविताएं, ग़ज़लें, शेर आदि शेयर करता हूँ उनको मैं सामान्यतः ऑनलाइन उपलब्ध ‘कविता कोश’ अथवा ‘Rekhta’ से लेता हूँ|)
आज के लिए इतना ही,
नमस्कार|
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