आज एक बार मैंहिन्दी श्रेष्ठ नवगीतकार और मेरे लिए गुरुतुल्य रहे स्वर्गीय डॉक्टर कुँवर बेचैन जी का एक नवगीत शेयर कर रहा हूँ|
इनकी बहुत सी रचनाएं मैंने पहले भी शेयर की हैं|
आज प्रस्तुत है स्वर्गीय डॉक्टर कुँवर बेचैन जी का यह नवगीत-

जीने का एक दिन
मरने के चार।
हमने लिए हैं उधार।
मटमैले मेज़पोश
लँगड़े ये स्टूल
ग़मलों में
गंधहीन काग़ज के फूल
रेतीली दीवारें
लोहे के द्वार।
हमने लिए हैं उधार।
दो गज़ की देहों को
दस-इंची वस्त्र
इस्पाती दुश्मन को
लकड़ी के शस्त्र
झुकी हुई पीठों पर
पर्वत के भार।
हमने लिए हैं उधार।
घाव-भरे पाँवों को
पथरीले पंथ
अनपढ़ की आँखों को
एम.ए. के ग्रंथ
फूलों-से हृदयों को
कांटों के हार।
हमने लिए हैं उधार।
(आभार- एक बात मैं और बताना चाहूँगा कि अपनी ब्लॉग पोस्ट्स में मैं जो कविताएं, ग़ज़लें, शेर आदि शेयर करता हूँ उनको मैं सामान्यतः ऑनलाइन उपलब्ध ‘कविता कोश’ अथवा ‘Rekhta’ से लेता हूँ|)
आज के लिए इतना ही,
नमस्कार|
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