आज एक बार मैं हिन्दी श्रेष्ठ कवि और नवगीतकार स्वर्गीय केदारनाथ सिंह जी का एक नवगीत शेयर कर रहा हूँ|
इनकी बहुत सी रचनाएं मैंने पहले भी शेयर की हैं|
आज प्रस्तुत है स्वर्गीय केदारनाथ सिंह जी का यह नवगीत-

धान उगेंगे कि प्रान उगेंगे
उगेंगे हमारे खेत में,
आना जी, बादल ज़रूर !
चन्दा को बाँधेंगे कच्ची कलगियों
सूरज को सूखी रेत में
आना जी, बादल ज़रूर !
आगे पुकारेगी सूनी डगरिया
पीछे झुके बन-बेंत
संझा पुकारेंगी गीली अखड़ियाँ
भोर हुए धन खेत;
आना जी, बादल ज़रूर !
धान कँपेंगे कि प्रान कँपेंगे
कँपेंगे हमारे खेत में,
आना जी, बादल ज़रूर !
धूप ढरे तुलसी-बन झरेंगे,
साँझ घिरे पर कनेर,
पूजा की वेला में ज्वार झरेंगे
धान-दिये की बेर,
आना जी बादल ज़रूर !
धान पकेंगे कि प्रान पकेगे
पकेंगे हमारे खेत में,
आना जी, बादल ज़रूर !
झीलों के पानी खजूर हिलेंगे,
खेतों में पानी बबूल,
पछुवा के हाथों में शाखें हिलेंगे,
पुरवा के हाथों में फूल,
आना जी बादल ज़रूर !
धान तुलेंगे कि प्रान तुलेंगे,
तुलेंगे हमारे खेत में,
आना जी बादल ज़रूर !
(आभार- एक बात मैं और बताना चाहूँगा कि अपनी ब्लॉग पोस्ट्स में मैं जो कविताएं, ग़ज़लें, शेर आदि शेयर करता हूँ उनको मैं सामान्यतः ऑनलाइन उपलब्ध ‘कविता कोश’ अथवा ‘Rekhta’ से लेता हूँ|)
आज के लिए इतना ही,
नमस्कार|
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