बिम्ब दुहरे-तिहरे!

आज एक बार फिर से मैं हिन्दी नवगीत के अमर कवि स्वर्गीय रमेश रंजक जी का एक नवगीत शेयर कर रहा हूँ|

रंजक जी की बहुत सी रचनाएं मैंने पहले भी शेयर की हैं|

लीजिए आज प्रस्तुत है स्वर्गीय रमेश रंजक जी का यह नवगीत –

 दर्द तुमने गाया क्या गीत, अधभरे घाव हरे हो गए
स्मृति सावन के सरसे मेघ चाँदनी के नखरे हो गए

गए दिवसों का शैशव-सिन्धु
अचानक भर लाया तूफ़ान
नेह की हर बीमार तरंग
लगी जैसे हो गई जवान
द्रवित सूनेपन की भर बाँह बिम्ब दुहरे-तिहरे हो गए

परसों ऊषा की पहली किरन
किसी कागा के बिखरे बोल
सलज अभिलाषा ने चुपचाप
दिया अन्तर ने अमृत घोल
प्राण ! प्यासे सपनों के रंग इन्द्रधनु से गहरे हो गए

उठी हियतल की सोंधी गन्ध
एक आभा बिखरी सुनहरी
अधर से फिसला ही था नाम
डाल दी कम्पन ने चूनरी
स्मिति आँसू आँगन के बीच कर्ण जग के बहरे हो गए

(आभार- एक बात मैं और बताना चाहूँगा कि अपनी ब्लॉग पोस्ट्स में मैं जो कविताएं, ग़ज़लें, शेर आदि शेयर करता हूँ उनको मैं सामान्यतः ऑनलाइन उपलब्ध ‘कविता कोश’ अथवा ‘Rekhta’ से लेता हूँ|)

आज के लिए इतना ही,

नमस्कार| 

                                   ********   

3 responses to “बिम्ब दुहरे-तिहरे!”

  1. नमस्कार 🙏🏻

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    1. नमस्कार जी

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  2. BUON INIZIO SETTIMANA

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