दिन चढ़े ही!

आज एक बार फिर से मैं प्रसिद्ध और श्रेष्ठ कवि श्री सोम ठाकुर जी का एक गीत शेयर कर रहा हूँ| सोम जी ने हमें अनेक अमर गीत दिए हैं|  

सोम जी की बहुत सी रचनाएं मैंने पहले भी शेयर की हैं|

लीजिए आज प्रस्तुत है श्री सोम ठाकुर जी का यह गीत –

 दिन चढ़े ही भूल बैठे हम
धूप के परिवार की भाषा
बोलती है रौशनी भी अब
मावसी आँधियार की भाषा

गालियाँ देंगी उन्हे मंज़िल
वक्त उनके नाम रोएगा
भोर का इतिहास भी उनकी
सिर्फ़ ज़िंदा लाश ढोएगा
नाव पर चढ़कर करेंगे जो
अनसुनी मझदार की भाषा

स्वप्न है बेशक बहारों के
है ज़रूरत आगमन की भी
मानते है बेड़ियाँ टूटी
तोड़िए जंजीर मन की भी
गीत – क्षण से कर सकेंगे हम
प्यास को संसार की भाषा

तू थकन का नाम मत ले रे
पर्वतों को पार करना है
मरुथलों को मेघ देने है
फागुनो में रंग भरना है
रंज है इस बात का हम को
सर्द है अंगार की भाषा

(आभार- एक बात मैं और बताना चाहूँगा कि अपनी ब्लॉग पोस्ट्स में मैं जो कविताएं, ग़ज़लें, शेर आदि शेयर करता हूँ उनको मैं सामान्यतः ऑनलाइन उपलब्ध ‘कविता कोश’ अथवा ‘Rekhta’ से लेता हूँ|)

आज के लिए इतना ही,

नमस्कार| 

                                   ********   

2 responses to “दिन चढ़े ही!”

  1. नमस्कार 🙏🏻

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    1. नमस्कार जी

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