आज एक बार फिर से मैं हिन्दी गीतों के राजकुंवर कहलाने वाले स्वर्गीय गोपाल दास नीरज जी का एक गीत शेयर कर रहा हूँ| नीरज जी ने हिन्दी साहित्य और हिन्दी फिल्मों को कुछ अमूल्य गीत दिए हैं|
नीरज जी की बहुत सी रचनाएं मैंने पहले भी शेयर की हैं|
लीजिए आज प्रस्तुत है स्वर्गीय गोपाल दास नीरज जी का यह गीत –

क्यों उसको जीवन भार न हो!
जो जीवन ताप मिटाती है
युग-२ की प्यास बुझाती है
इसके अधरों तक जाकर वह मधु मदिरा ही विष बन जाए।
क्यों उसको जीवन भार न हो..
जो हिम सी शीतल शांत सजल
है जीवन पंथी की मंजिल
वह अमर मौत भी एक बार जिसकी मिट्टी से घबराए।
क्यों उसको जीवन भार न हो..
लिखकर दिल हल्का हो जाता
गाकर जिसको गम सो जाता
पर इसके प्राणों में उसकी कविता ही क्रन्दन उपजाए।
क्यों उसको जीवन भार न हो..
(आभार- एक बात मैं और बताना चाहूँगा कि अपनी ब्लॉग पोस्ट्स में मैं जो कविताएं, ग़ज़लें, शेर आदि शेयर करता हूँ उनको मैं सामान्यतः ऑनलाइन उपलब्ध ‘कविता कोश’ अथवा ‘Rekhta’ से लेता हूँ|)
आज के लिए इतना ही,
नमस्कार|
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