यह पावस की सांझ रंगीली!

आज एक बार फिर से मैं, हिन्दी गीत के शिखर पुरुष और अपने गीतों से  श्रोताओं को मंत्रमुग्ध करने वाले स्वर्गीय हरिवंशराय बच्चन जी का एक गीत शेयर कर रहा हूँ|

बच्चन जी की बहुत सी रचनाएं मैंने पहले भी शेयर की हैं|

लीजिए आज प्रस्तुत है स्वर्गीय हरिवंशराय बच्चन जी का यह गीत –

यह पावस की सांझ रंगीली!

फैला अपने हाथ सुनहले
रवि, मानो जाने से पहले,
लुटा रहा है बादल दल में अपनी निधि कंचन चमकीली!
यह पावस की सांझ रंगीली!

घिरे घनों से पूर्व गगन में
आशाओं-सी मुर्दा मन में,
जाग उठा सहसा रेखाएँ-लाल, बैगनी, पीली, नीली!
यह पावस की सांझ रंगीली!

इंद्र धनुष की आभा सुंदर
साथ खड़े हो इसी जगह पर
थी देखी उसने औ’ मैंने–सोच इसे अब आँखें गीली!
यह पावस की सांझ रंगीली!

(आभार- एक बात मैं और बताना चाहूँगा कि अपनी ब्लॉग पोस्ट्स में मैं जो कविताएं, ग़ज़लें, शेर आदि शेयर करता हूँ उनको मैं सामान्यतः ऑनलाइन उपलब्ध ‘कविता कोश’ अथवा ‘Rekhta’ से लेता हूँ|)

आज के लिए इतना ही,

नमस्कार| 

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One response to “यह पावस की सांझ रंगीली!”

  1. नमस्कार 🙏🏻

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