सुई!

आज मैं हिन्दी और राजस्थानी भाषाओं के श्रेष्ठ कवि स्वर्गीय हरीश भादानी जी का एक गीत शेयर कर रहा हूँ|

भादानी जी की कुछ रचनाएं मैंने पहले भी शेयर की हैं|

लीजिए आज प्रस्तुत है स्वर्गीय हरीश भादानी जी का यह गीत –

सुबह उधेड़े शाम उधेड़े
बजती हुई सुई

          सीलन और धुएं के खेतों
          दिन भर रूई चुनें
          सूजी हुई आंख के सपने
          रातों सूत बुनें
आंगन के उठने से पहले
रचदे एक कमीज रसोई
          एक तलाश पहन कर भागे
          किरणें छुई-मुई
          बजती हुई सुई

धरती भर कर चढ़े तगारी
बांस-बांस आकाश
फरनस को अगियाया रखती
सांसें दे दे घास

सूरज की साखी में बंटते
अंगुली जितने आज और कल
          बोले कोई उम्र अगर तो
          तीबे नई सुई
          बजती हुई सुई

(आभार- एक बात मैं और बताना चाहूँगा कि अपनी ब्लॉग पोस्ट्स में मैं जो कविताएं, ग़ज़लें, शेर आदि शेयर करता हूँ उनको मैं सामान्यतः ऑनलाइन उपलब्ध ‘कविता कोश’ अथवा ‘Rekhta’ से लेता हूँ|)

आज के लिए इतना ही,

नमस्कार| 

                                   ********   

2 responses to “सुई!”

  1. नमस्कार 🙏🏻

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    1. नमस्कार जी

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