फूल झरे!

आज मैं प्रसिद्ध हिन्दी नवगीतकार श्री बुद्धिनाथ मिश्र जी का एक नवगीत शेयर कर रहा हूँ|

श्री मिश्र जी की बहुत सी रचनाएं मैंने पहले भी शेयर की हैं|

लीजिए आज प्रस्तुत है श्री बुद्धिनाथ मिश्र जी का यह नवगीत –

फूल झरे जोगिन के द्वार
हरी-हरी अँजुरी में
भर-भर के प्रीत नई
रात करे चाँद की गुहार ।

केसर-क्यारी से
बहकी हिरना साँवरी
ठुमुक-ठुमुक चले
कहीं रुके नहीं पाँव री
कहाँ तेरा हाट-बाट
कहाँ तेरा गाँव री ?

बादल की चुनरी पसार
काँप-काँप, अंग-छवि
बावरी अँजोरिया
ताल में निहारे बार-बार ।

पीपर की छाँह बसे
छुई-मुई प्रीत रे
अधरों से झाँक रहे
अधसँवरे गीत रे
अनजाने नाम लिखे
सीपियों के मीत रे

रेत भरे तीर को बुहार
रोम-रोम से अधीर
दर्द सब निचोड़ कौन
भेज रहा प्रिया को दुलार ।


बगुले-सी आस तिरे
मन में दिन-रैन रे
धनही पगडंडी पर
बिछुआ बेचैन रे
सुलझ रहे स्वप्न-बंध
उलझ रहे नैन रे

कौन परी तोड़ गयी हार!
एक-एक पंखुरी पर
अल्पना रचा गयी
बाँसुरी सुना गयी मल्हार ।

(आभार- एक बात मैं और बताना चाहूँगा कि अपनी ब्लॉग पोस्ट्स में मैं जो कविताएं, ग़ज़लें, शेर आदि शेयर करता हूँ उनको मैं सामान्यतः ऑनलाइन उपलब्ध ‘कविता कोश’ अथवा ‘Rekhta’ से लेता हूँ|)

आज के लिए इतना ही,

नमस्कार| 

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5 responses to “फूल झरे!”

  1. Very beautiful poem🙏

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  2. नमस्कार 🙏🏻

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    1. नमस्कार जी

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