आज एक बार फिर मैं प्रसिद्ध हिन्दी गीत एवं ग़ज़ल लेखक स्वर्गीय शेरजंग गर्ग जी का एक गीत शेयर कर रहा हूँ|
गर्ग जी की बहुत सी रचनाएं मैंने पहले भी शेयर की हैं|
लीजिए आज प्रस्तुत है स्वर्गीय शेरजंग गर्ग जी का यह गीत –

उनके कहने से गुनहगार हुए बैठे हैं,
उनकी ख़ातिर ही सज़ावार हुए बैठे हैं ।
एक कारण है महज़ अपनी मुस्कराहट का,
उनकी नज़रों में गिरफ़्तार हुए बैठे हैं ।
उनकी हर शिकायत का ज़हर पी लूँगा,
उनकी हर एक शरारत का ज़हर पी लूँगा ।
बाद मरने के मेरे उनको मुहब्बत तो रहे,
इसलिए झूम कर नफ़रत का ज़हर पी लूँगा ।
रात को है चाँदतारों का नशा,
फूल को मधुमय बहारों का नशा ।
आँख क्या उनसे मिली है प्यार से,
चढ़ गया दिल पर इशारों का नशा ।
रूप की रेशमी बाँहों का गिला क्या करना,
उनकी रूठी-सी निगाहों का गिला क्या करना ।
ख़ुद ही लाख प्रयत्नों पे भी न सुधरे हमीं,
आज फिर उनके गुनाहों का गिला क्या करना !
(आभार- एक बात मैं और बताना चाहूँगा कि अपनी ब्लॉग पोस्ट्स में मैं जो कविताएं, ग़ज़लें, शेर आदि शेयर करता हूँ उनको मैं सामान्यतः ऑनलाइन उपलब्ध ‘कविता कोश’ अथवा ‘Rekhta’ से लेता हूँ|)
आज के लिए इतना ही,
नमस्कार|
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