आज एक बार फिर मैं हिन्दी के प्रसिद्ध कवि स्वर्गीय केदारनाथ सिंह जी का एक नवगीत शेयर कर रहा हूँ| इनकी कविताओं को अज्ञेय जी द्वारा संपादित ‘तीसरा सप्तक’ में भी शामिल किया गया था|
इनकी कुछ रचनाएं मैंने पहले भी शेयर की हैं|
लीजिए आज प्रस्तुत हैं स्वर्गीय केदारनाथ सिंह जी का यह नवगीत –

टहनी के टूसे पतरा गए !
पकड़ी को पात नए आ गए !
नया रंग देशों से फूटा
वन भींज गया,
दुहरी यह कूक, पवन झूठा —
मन भींज गया,
डाली-डाली स्वर छितरा गए !
पात नए आ गए !
कोर डिठियों की कड़ुवाई
रंग छूट गया,
बाट जोहते आँखें आईं
दिन टूट गया,
राहों के राही पथरा गए,
पात नए आ गए !
(आभार- एक बात मैं और बताना चाहूँगा कि अपनी ब्लॉग पोस्ट्स में मैं जो कविताएं, ग़ज़लें, शेर आदि शेयर करता हूँ उनको मैं सामान्यतः ऑनलाइन उपलब्ध ‘कविता कोश’ अथवा ‘Rekhta’ से लेता हूँ|)
आज के लिए इतना ही,
नमस्कार|
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