आज एक बार फिर मैं हिन्दी के श्रेष्ठ नवगीतकार स्वर्गीय श्रीकृष्ण तिवारी जी का एक नवगीत शेयर कर रहा हूँ|
इनकी कुछ रचनाएं मैंने पहले भी शेयर की हैं|
लीजिए आज प्रस्तुत है स्वर्गीय श्रीकृष्ण तिवारी जी का यह नवगीत –

कुछ के रुख दक्षिण
कुछ वाम
सूरज के घोड़े हो गए
बेलगाम
थोड़ी- सी तेज हुई हवा
और हिल गई सड़क
लुढ़क गया शहर एक ओर
ख़ामोशी उतर गई केंचुल -सी
माथे के उपर बहने लगा
तेज धार पानी सा शोर
अफ़वाहों के हाथों
चेक की तरह भूनने लग गई
आवारा सुबह और शाम
पत्थर को चीरती हुई सभी
आवाज़ें कहीं गईं मर
गरमाहट सिर्फ राख की
जिन्दा है इस मौसम भर
ताश -महल फिर बनने लग गया
चुस्त लगे होने फिर
हुकुम के गुलाम |
(आभार- एक बात मैं और बताना चाहूँगा कि अपनी ब्लॉग पोस्ट्स में मैं जो कविताएं, ग़ज़लें, शेर आदि शेयर करता हूँ उनको मैं सामान्यतः ऑनलाइन उपलब्ध ‘कविता कोश’ अथवा ‘Rekhta’ से लेता हूँ|)
आज के लिए इतना ही,
नमस्कार|
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