आज एक बार फिर मैं हिन्दी नवगीत के पुरोधा स्वर्गीय शंभुनाथ सिंह जी का एक नवगीत शेयर कर रहा हूँ|
इनकी बहुत सी रचनाएं मैंने पहले भी शेयर की हैं|
लीजिए आज प्रस्तुत है स्वर्गीय शंभुनाथ सिंह जी का यह नवगीत –

उत्खनन किया है मैंने
गहराई तक अतीत का ।
सिन्धु-सभ्यता से अब तक
मुझको एक ही स्तर मिला,
ईंट-पत्थरों के घर थे
सोने का नहीं घर मिला,
युद्धों के अस्त्र मिले पर
वृत्त नहीं हार-जीत का ।
यज्ञकुण्ड अग्निहोत्र के
मिले नाम गोत्र प्रवर भी
सरस्वती की दिशा मिली
पणियों के ग्राम-नगर भी
कोई अभिलेख पर नहीं
सामगान के प्रगीत का ।
क़ब्रों में ठठरियाँ मिलीं
टूटे उजड़े भवन मिले,
मिट्टी में ब्याज मिल गए
पर न कहीं मूल-धन मिले,
आदमी मिला कहीं नहीं
जीवित साक्षी व्यतीत का ।
मिट्टी के खिलौने मिले
चित्रित मृतभाण्ड भी मिले ।
सड़कों-चौराहों के बीच
हुए युद्ध-काण्ड भी मिले,
कोई ध्वनि-खण्ड पर नहीं
मिला किसी बातचीत का ।
मन्दिर गोपुर शिखर मिले
देवता सभी मरे मिले
उकरे युगनद्ध युग्म भी
दीवारों पर भरे मिले ।
सहते आए हैं अब तक
जो संकट ताप-शीत का ।
(आभार- एक बात मैं और बताना चाहूँगा कि अपनी ब्लॉग पोस्ट्स में मैं जो कविताएं, ग़ज़लें, शेर आदि शेयर करता हूँ उनको मैं सामान्यतः ऑनलाइन उपलब्ध ‘कविता कोश’ अथवा ‘Rekhta’ से लेता हूँ|)
आज के लिए इतना ही,
नमस्कार|
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