गणित का गीत!

आज एक बार फिर मैं किसी जमाने में काव्य मंचों पर अपने गीतों के माध्यम से धूम मचाने वाले श्रेष्ठ हिन्दी कवि स्वर्गीय मुकुट बिहारी सरोज जी का एक गीत शेयर कर रहा हूँ|

सरोज जी की बहुत सी रचनाएं मैंने पहले भी शेयर की हैं|

लीजिए आज प्रस्तुत है स्वर्गीय मुकुट बिहारी सरोज जी का यह गीत –

हो गया है हर इकाई का विभाजन
राम जाने गिनतियाँ कैसे बढ़ेंगी ?

अंक अपने आप में पूरा नहीं है
इसलिए कैसे दहाई को पुकारे
मान, अवमूल्यित हुआ है सैकड़ों का
कौन इस गिरती व्यवस्था को सुधारे

जोड़-बाकी एक से दिखने लगते हैं
राम जाने पीढियां कैसे पढ़ेंगी ?

शेष जिसमें कुछ नहीं ऐसी इबारत
ग्रन्थ के आकार में आने लगी है
और मज़बूरी, बिना हासिल किए कुछ
साधनों का कीर्तन गाने लगी है

माँग का मुद्रण नहीं करती मशीनें
राम जाने क़ीमतें कितनीं चढेंगी ?

भूल बैठे हैं, गणित, व्यवहार का हम
और बिल्कुल भिन्न होते जा रहे हैं
मूलधन इतना गँवाया है कि ख़ुद से
ख़ुद-ब-ख़ुद ही खिन्न होते जा रहे हैं

भाग दें तो भी बड़ी मुश्किल रहेगी
राम जाने सर्जनाएँ क्या गढेंगी ?

(आभार- एक बात मैं और बताना चाहूँगा कि अपनी ब्लॉग पोस्ट्स में मैं जो कविताएं, ग़ज़लें, शेर आदि शेयर करता हूँ उनको मैं सामान्यतः ऑनलाइन उपलब्ध ‘कविता कोश’ अथवा ‘Rekhta’ से लेता हूँ|)

आज के लिए इतना ही,

नमस्कार| 

                                   ********   

3 responses to “गणित का गीत!”

  1. ईश्वर सामूहिक अचेतन में है
    आत्मा के पात्र में
    वह हर व्यक्ति से सपने में बात करता है
    चाहे ब्राह्मण
    चाहे वह सबसे निचली जाति से हो
    वह सभी प्राणियों का नेतृत्व करता है
    उसकी इच्छा के अनुसार
    उसके अर्थ के अनुसार

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  2. नमस्कार 🙏🏻

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    1. नमस्कार जी

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