आज एक बार फिर मैं हिन्दी नवगीत के ख्यातिलब्ध हस्ताक्षर माहेश्वर तिवारी जी का एक नवगीत शेयर कर रहा हूँ और हाँ आज पहली बार उनके नाम के साथ ‘स्वर्गीय’ जोड़ना पड़ेगा क्योंकि आज सुबह ही उनके निधन का दुखद समाचार प्राप्त हुआ|
माहेश्वर जी की अनेक रचनाएं मैंने पहले भी शेयर की हैं|
लीजिए आज प्रस्तुत है स्वर्गीय माहेश्वर तिवारी जी का यह नवगीत –

गहरे-गहरे से पदचिह्न ।
घर की दहलीजों के नीचे,
गहरे-गहरे से पदचिह्न ।
कल तक जो थे मेरे साथ
दिखते उनसे बिलकुल भिन्न ।
गहरे-गहरे से पदचिह्न ।
ताज़े, पर अपरिचित अनाम
अभी छोड़ गई इन्हें शाम
जाने क्यों हो करके खिन्न ।
गहरे-गहरे से पदचिह्न ।
कोई चौराहे तक जाए
और इन्हें वहीं छोड़ आए
ऐसा न हो कल के दिन ।
गहरे-गहरे से पदचिह्न ।
(आभार- एक बात मैं और बताना चाहूँगा कि अपनी ब्लॉग पोस्ट्स में मैं जो कविताएं, ग़ज़लें, शेर आदि शेयर करता हूँ उनको मैं सामान्यतः ऑनलाइन उपलब्ध ‘कविता कोश’ अथवा ‘Rekhta’ से लेता हूँ|)
आज के लिए इतना ही,
नमस्कार|
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