आज एक बार फिर मैं अपने अत्यंत प्रिय नवगीतकार स्वर्गीय रमेश रंजक जी का एक नवगीत शेयर कर रहा हूँ| मेरा यह सौभाग्य रहा कि मुझे अनेक बार उनका काव्यपाठ सुनने, उनसे बात करने का भी अवसर मिला|
रंजक जी की अनेक रचनाएं मैंने पहले भी शेयर की हैं|
लीजिए आज प्रस्तुत है स्वर्गीय रमेश रंजक जी का यह नवगीत –

दिन निकलने दे
ज़रा-सा दिन निकलने दे !
रास्ते आधे-अधूरे-से
दिख रहे जो तानपूरे-से
तार में सरगम सँभलने दे
थम, ज़रा-सा दिन निकलने दे !
राग जब आकार पाएगा
स्याह घेरा टूट जाएगा
ख़ून स्याही में उबलने दे
थम, ज़रा-सा दिन निकलने दे !
उँगलियाँ ख़ुद तार को छूकर
व्योम को ले आएँगी भू पर
घाटियों को आँख मलने दे
थम, ज़रा-सा दिन निकलने दे !
(आभार- एक बात मैं और बताना चाहूँगा कि अपनी ब्लॉग पोस्ट्स में मैं जो कविताएं, ग़ज़लें, शेर आदि शेयर करता हूँ उनको मैं सामान्यतः ऑनलाइन उपलब्ध ‘कविता कोश’ अथवा ‘Rekhta’ से लेता हूँ|)
आज के लिए इतना ही,
नमस्कार|
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