आज एक बार फिर मैं अपने समय के प्रसिद्ध गीतकार स्वर्गीय रमानाथ अवस्थी जी का एक गीत शेयर कर रहा हूँ|
अवस्थी जी की अनेक रचनाएं मैंने पहले भी शेयर की हैं|
लीजिए आज प्रस्तुत है स्वर्गीय रमानाथ अवस्थी जी का यह गीत –

प्यार से मुझको बुलाओगे जहाँ
एक क्या सौ बार आऊँगा वहाँ
पूछने की है नहीं फ़ुर्सत मुझे
कौन हो तुम क्या तुम्हारा नाम है
किस लिए मुझको बुलाते हो कहाँ
कौन सा मुझसे तुम्हारा काम है
फूल से तुम मुस्कुराओगे जहाँ
मैं भ्रमर सा गुनगुनाऊँगा वहां
कौन मुझको क्या समझता है यहाँ
आज तक इस पर कभी सोचा नहीं
आदमी मेरे लिए सबसे बड़ा
स्वर्ग में या नरक में वह हो कहीं
आदमी को तुम झुकाओगे जहाँ
प्राण की बाजी लगाऊँगा वहाँ
जानता हूँ एक दिन मैं फूल-सा
टूट जाऊँगा बिखरने के लिए
फिर न आऊँगा तुम्हारे रूप की
रौशनी में स्नान करने के लिए
किन्तु तुम मुझको भूलाओगे जहाँ
याद अपनी मैं दिलाऊँगा वहाँ
मैं नहीं कहता कि तुम मुझको मिलो
और मिल कर दूर फिर जाओ चले
चाहता हूँ मैं तुम्हें देखा करूँ
बादलों से दूर जा नभ के तले
सर उठाकर तुम झुकाओगे जहाँ
बूँद बन-बन टूट जाऊँगा वहाँ
(आभार- एक बात मैं और बताना चाहूँगा कि अपनी ब्लॉग पोस्ट्स में मैं जो कविताएं, ग़ज़लें, शेर आदि शेयर करता हूँ उनको मैं सामान्यतः ऑनलाइन उपलब्ध ‘कविता कोश’ अथवा ‘Rekhta’ से लेता हूँ|)
आज के लिए इतना ही,
नमस्कार|
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