आज एक बार फिर मैं हिन्दी के श्रेष्ठ गीतकार और मेरे लिए गुरु तुल्य रहे स्वर्गीय कुँवर बेचैन जी का एक नवगीत शेयर कर रहा हूँ|
बेचैन जी की अनेक रचनाएं मैंने पहले भी शेयर की हैं|
लीजिए आज प्रस्तुत है स्वर्गीय कुँवर बेचैन जी का यह नवगीत –

दुनिया के “ऑफिस” में अब तो
बैठे हैं यह प्राण
लिपिक से ।
परित्यक्ता सी
कई फाइलें
अलग-अलग मेजों पर चुप हैं
उनके घूंघट
जैसे अंधे कोटपीस की-
छिपी तुरूप हैं
कई रिश्वतें
“गर्ल फ्रेंड्स-सी
झाँक रहीं बाहर की
“चिक” से ।
कॉफी के
प्यालों पर क्रमश:
बिखरे हुए प्यारे के किस्से
कुछ मँहगाई के पत्थर से
चटखे हुए
हृदय के हिस्से
सोच रहे
अब हम आफिस से
भागें कहाँ,
कौन सी
“ट्रिक से।
(आभार- एक बात मैं और बताना चाहूँगा कि अपनी ब्लॉग पोस्ट्स में मैं जो कविताएं, ग़ज़लें, शेर आदि शेयर करता हूँ उनको मैं सामान्यतः ऑनलाइन उपलब्ध ‘कविता कोश’ अथवा ‘Rekhta’ से लेता हूँ|)
आज के लिए इतना ही,
नमस्कार|
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