मृत्यु-अक्षांशों तक!

आज एक बार फिर मैं हिन्दी के श्रेष्ठ कवि और मधुर गीतकार श्री सोम ठाकुर  जी का एक गीत शेयर कर रहा हूँ|

सोम जी की अनेक रचनाएं मैंने पहले भी शेयर की हैं|

लीजिए आज प्रस्तुत है श्री सोम ठाकुर जी का यह गीत –

उफ़ने ज्वालामुखी मृत्यु – अक्षान्शो तक
गूंगी -नंगी सदी नहाई लावे में

गर्म आँधियाँ बिधने लगी हरे वन में
लपटों के झरने झरते, उबली नदियाँ
लाल -बैंज़नी दाहो के बीच भूनी नज़रे
पंख खोलते हुए मर गयी जलपरियाँ
हाड़ -माँस के ढेर लगे हैं मोडों पर
चील -गिद्ध हैं अपने – अपने दावे में

चीख लिए लौटे भूकंप दिशाओ से
पर्तों -दबा गुँथी बाहों में कसा गगन
चौंकी बस्ती, बहके शहरों – गावों को
फिर निचोड़ देगी चट्टानों की ऐंठन
अंगारे, धसती धरती, गंधकी धुआँ
भेद बहुत है मौसम के बर्ताव में

अभिशापित उर्जा -दैत्यों की होड़ यहाँ
शिलालेख लिख देगी नये अमंगल के
अंकित कर दन्शित उभार की नीचाई
हम साँचे बन जाएँगे बीते कल के
वक्त हमें ‘फाँसिल’ कर देगा, कौन यहाँ
आए श्वेत कपोतों के बहकावों में
गूंगी नदी सदी नहाई – लावे में

(आभार- एक बात मैं और बताना चाहूँगा कि अपनी ब्लॉग पोस्ट्स में मैं जो कविताएं, ग़ज़लें, शेर आदि शेयर करता हूँ उनको मैं सामान्यतः ऑनलाइन उपलब्ध ‘कविता कोश’ अथवा ‘Rekhta’ से लेता हूँ|)

आज के लिए इतना ही,

नमस्कार| 

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4 responses to “मृत्यु-अक्षांशों तक!”

  1. बहुत सुंदर।

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    1. हार्दिक धन्यवाद जी

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  2. नमस्कार 🙏🏻

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    1. नमस्कार जी

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