आज एक बार फिर मैं हिन्दी के प्रसिद्ध व्यंग्यकार और कवि स्वर्गीय रवींद्रनाथ त्यागी जी की एक कविता शेयर कर रहा हूँ|
त्यागी जी की कुछ रचनाएं मैंने पहले भी शेयर की हैं|
लीजिए आज प्रस्तुत है स्वर्गीय रवींद्रनाथ त्यागी जी की यह कविता –

ग्राम अलका अप्सराएँ
पनघट पर नीर भरे!
सुन्दर सजीले अंग
अचल हिले खुले पंख
वस्त्र कसे, करे व्यंग्य
अधर रस बूंद भरे!
अचल हिलाता मारूत
धीरे-धीरे बजे नुपुर
उर-उर में मधुर
अंग में उमंग भरे!
मधुर हास स्नेह सने
खींच वारि कर थमे,
घूंघट तूणीर, तने-
नयनों के बाण चले!
आर्द्र-द्रुम छाया सघन
नभ नील-उज्ज्वल घन
हँसती-सी मलयज पवन
पुष्पों के पंख हिले!
उच्च नील शैल झलक
देता, आ घट में छलक
होती फिर हास किलक
काम कल चाप धर!
विहँस उड़ी विहग वधू
नीड़ चलीं ग्राम वधू
प्राणों की वीणा में
जीवन का राग भरे।
(आभार- एक बात मैं और बताना चाहूँगा कि अपनी ब्लॉग पोस्ट्स में मैं जो कविताएं, ग़ज़लें, शेर आदि शेयर करता हूँ उनको मैं सामान्यतः ऑनलाइन उपलब्ध ‘कविता कोश’ अथवा ‘Rekhta’ से लेता हूँ|)
आज के लिए इतना ही,
नमस्कार|
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