आज एक बार फिर मैं श्रेष्ठ हिन्दी कवि और ग़ज़ल लेखक श्री सूर्यभानु गुप्त जी की एक ग़ज़ल शेयर कर रहा हूँ|
गुप्त जी की बहुत सी रचनाएं मैंने पहले भी शेयर की हैं|
लीजिए आज प्रस्तुत है श्री सूर्यभानु गुप्त जी की यह ग़ज़ल –

अपने घर में ही अजनबी की तरह
मैं सुराही में इक नदी की तरह
एक ग्वाले तलक गया कर्फ़्यू
ले के सड़कों को बन्सरी की तरह
किससे हारा मैं, ये मेरे अन्दर
कौन रहता है ब्रूस ली की तरह
उसकी सोचों में मैं उतरता हूँ
चाँद पर पहले आदमी की तरह
अपनी तनहाइयों में रखता है
मुझको इक शख़्स डायरी की तरह
मैंने उसको छुपा के रक्खा है
ब्लैक आउट में रोशनी की तरह
टूटे बुत रात भर जगाते हैं
सुख परीशां है गज़नवी की तरह
बर्फ़ गिरती है मेरे चेहरे पर
उसकी यादें हैं जनवरी की तरह
वक़्त-सा है अनन्त इक चेहरा
और मैं रेत की घड़ी की तरह
(आभार- एक बात मैं और बताना चाहूँगा कि अपनी ब्लॉग पोस्ट्स में मैं जो कविताएं, ग़ज़लें, शेर आदि शेयर करता हूँ उनको मैं सामान्यतः ऑनलाइन उपलब्ध ‘कविता कोश’ अथवा ‘Rekhta’ से लेता हूँ|)
आज के लिए इतना ही,
नमस्कार|
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