रक्तमुख!

आज एक बार फिर मैं श्रेष्ठ हिन्दी कवि स्वर्गीय जानकीवल्लभ शास्त्री जी की एक कविता शेयर कर रहा हूँ|

इनकी कुछ रचनाएं मैंने पहले भी शेयर की हैं|

लीजिए आज प्रस्तुत है स्वर्गीय जानकीवल्लभ शास्त्री जी की यह कविता –

कुपथ कुपथ रथ दौड़ाता जो
पथ निर्देशक वह है,


लाज लजाती जिसकी कृति से
धृति उपदेश वह है,


मूर्त दंभ गढ़ने उठता है
शील विनय परिभाषा,
मृत्यु रक्तमुख से देता
जन को जीवन की आशा,
जनता धरती पर बैठी है
नभ में मंच खड़ा है,


जो जितना है दूर मही से
उतना वही बड़ा है.

(आभार- एक बात मैं और बताना चाहूँगा कि अपनी ब्लॉग पोस्ट्स में मैं जो कविताएं, ग़ज़लें, शेर आदि शेयर करता हूँ उनको मैं सामान्यतः ऑनलाइन उपलब्ध ‘कविता कोश’ अथवा ‘Rekhta’ से लेता हूँ|)

आज के लिए इतना ही,

नमस्कार| 

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4 responses to “रक्तमुख!”

  1. बहुत सुंदर।

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    1. हार्दिक धन्यवाद जी

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  2. नमस्कार 🙏🏻

    Liked by 1 person

    1. नमस्कार जी

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