धान जब भी फूटता है!

आज एक बार फिर मैं वरिष्ठ एवं श्रेष्ठ हिन्दी नवगीतकार श्री बुद्धिनाथ मिश्र  जी का एक नवगीत शेयर कर रहा हूँ|

मिश्र जी की बहुत सी रचनाएं मैंने पहले भी शेयर की हैं|

लीजिए आज प्रस्तुत है श्री बुद्धिनाथ मिश्र जी का यह नवगीत –

धान जब भी फूटता है गाँव में
एक बच्चा दुधमुँहा किलकारियाँ भरता हुआ
आ लिपट जाता हमारे पाँव में।

नाप आती छागलों से ताल-पोखर
सुआपाखी मेड़
एक बिटिया-सी किरण है
रोप देती चांदनी का पेड़

काटते कीचड़ सने तन का बुढ़ापा
हम थके-हारे उसी की छाँव में।

धान-खेतों में हमें मिलती
सुखद नवजात शिशु की गंध
ऊख जैसी यह गृहस्थी
गाँठ का रस बाँटती निर्बंध

यह गरीबी और जाँगरतोड़ मिहनत
हाथ दो, सौ छेद जैसे नाव में।

फैल जाती है सिघाड़े की लतर-सी
पीर मन की छेंकती है द्वार
तोड़ते किस तरह मौसम के थपेड़े
जानती कमला नदी की धार

लहलहाती नहीं फसलें बतकही से
कह रहे हैं लोग गाँव-गिराँव में।

(आभार- एक बात मैं और बताना चाहूँगा कि अपनी ब्लॉग पोस्ट्स में मैं जो कविताएं, ग़ज़लें, शेर आदि शेयर करता हूँ उनको मैं सामान्यतः ऑनलाइन उपलब्ध ‘कविता कोश’ अथवा ‘Rekhta’ से लेता हूँ|)

आज के लिए इतना ही,

नमस्कार| 

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3 responses to “धान जब भी फूटता है!”

  1. हम सब भी हैं
    नजाने कहां से
    लगाए
    नाल में
    जन्म के लिये
    उम्र के साथ
    मौत के साथ
    आइए धरती माता की ओर लौटें

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  2. नमस्कार 🙏🏻

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    1. नमस्कार जी

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