आज एक बार फिर मैं विख्यात हिन्दी साहित्यकार एवं श्रेष्ठ कवि श्री रामदरश मिश्र जी की एक रचना शेयर कर रहा हूँ|
मिश्र जी की बहुत सी रचनाएं मैंने पहले भी शेयर की हैं|
लीजिए आज प्रस्तुत है श्री रामदरश मिश्र जी की यह रचना –

आपके संगमरमरी मकान का दरवाज़ा
पारदर्शी शीशे का है
उसमें से बाहर के चेहरे दिखाई पड़ते हैं
अपना चेहरा नहीं
आपकी धूमिल आँखों को लगता है कि
बाहर के चेहरे
कटी-फटी मैली लकीरों से भरे हुए हैं
आपके शानदार स्नानघर में
एक जादुई आईना लगा हुआ है
जो सच नहीं
वह दिखाता है जो आप देखना चाहते हैं
उसके घर का दरवाज़ा लकड़ी का है
जिसमें जालियाँ लगी हुई हैं
कमरे से बाहर से हवाएँ तो आती हैं
चेहरे नहीं दिखाई पड़ते
उसने अपने कमरे में
एक मामूली सा आईना लगा रखा है
उसके सामने जब खड़ा होता है
तब अपने को सही देख लेता है
और जब बाहर निकलता है
तब लगता है कि
बाहर के सारे चेहरे उसके चेहरे से सुंदर हैं।
(आभार- एक बात मैं और बताना चाहूँगा कि अपनी ब्लॉग पोस्ट्स में मैं जो कविताएं, ग़ज़लें, शेर आदि शेयर करता हूँ उनको मैं सामान्यतः ऑनलाइन उपलब्ध ‘कविता कोश’ अथवा ‘Rekhta’ से लेता हूँ|)
आज के लिए इतना ही,
नमस्कार|
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