आज मैं विख्यात हिन्दी नवगीतकार स्वर्गीय ठाकुरप्रसाद सिंह जी की एक रचना शेयर कर रहा हूँ|
इनकी कुछ रचनाएं मैंने पहले भी शेयर की हैं|
लीजिए आज प्रस्तुत है स्वर्गीय ठाकुरप्रसाद सिंह जी की यह रचना –

नदिया का घना-घना कूल है
वंशी से बेधो मत प्यारे
यह मन तो बिंधा हुआ फूल है
नदिया का घना-घना कूल है
थिर है नदिया का जल जामुनी
तिरती रे छाया मनभावनी
याद नहीं आती क्या चांदनी!
पिछला जीवन क्या फिजूल है ?
नदिया का घना-घना कूल है
मैं आई जल भर हूँ आनने
या नहीं की सुख के दिन मांगने
जो जाता बीते फल थामने
करता वह बहुत बड़ी भूल है
नदिया का घना-घना कूल है
(आभार- एक बात मैं और बताना चाहूँगा कि अपनी ब्लॉग पोस्ट्स में मैं जो कविताएं, ग़ज़लें, शेर आदि शेयर करता हूँ उनको मैं सामान्यतः ऑनलाइन उपलब्ध ‘कविता कोश’ अथवा ‘Rekhta’ से लेता हूँ|)
आज के लिए इतना ही,
नमस्कार|
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