अज्ञेय जी द्वारा संपादित सप्तकों के कवियों की कविताएं और उसमें से चौथा सप्तक के कवियों की रचनाएं शेयर करने के क्रम में आज मैं श्री नन्दकिशोर आचार्य जी की एक कविता शेयर कर रहा हूँ|
इनकी कविताएं शायद मैंने पहले शेयर नहीं की हैं|
लीजिए आज प्रस्तुत है श्री नन्दकिशोर आचार्य जी की यह कविता –

बुरा तो नहीं मानोगे
यदि मुझे अब
तुम्हारी बाँसुरी बने रहना
स्वीकार नहीं।
यह नहीं कि मैं उपेक्षित हुआ
बल्कि अधरों पर तुम्हारे सदा
सज्जित रहा,
किन्तु मेरा कब रहा संगीत वह
जो मेरे ही रन्ध्र-रन्ध्र से बहा ?
मुझे से तो अच्छी रही
वह मोरपाँख
जो तुम्हारे मुकुट पर चढ़ी
और न भी चढ़ती
पर जिस का सौन्दर्य
उस का अपना था।
यह अन्तर क्या कम है
कि तुम्हारा संगीत
मेरी विवशता है
और मोरपाँख का सौन्दर्य
तुम्हारी ?
बुरा न मानना
कि अब मैं
तुम्हारी बाँसुरी नहीं रहा
(आभार- एक बात मैं और बताना चाहूँगा कि अपनी ब्लॉग पोस्ट्स में मैं जो कविताएं, ग़ज़लें, शेर आदि शेयर करता हूँ उनको मैं सामान्यतः ऑनलाइन उपलब्ध ‘कविता कोश’ अथवा ‘Rekhta’ से लेता हूँ|)
आज के लिए इतना ही,
नमस्कार|
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