अज्ञेय जी द्वारा संपादित सप्तकों के कवियों की कविताएं और उसमें से चौथा सप्तक के कवियों की रचनाएं शेयर करने के क्रम में आज मैं स्वर्गीय स्वदेश भारती जी की एक कविता शेयर कर रहा हूँ|
इनकी शायद एक ही रचना मैंने पहले शेयर की है|
लीजिए आज प्रस्तुत है स्वर्गीय स्वदेश भारती जी की यह कविता –

तुम्हें याद करूँगा
उम्र के कगार पर बैठ
दोपहर के सन्नाटे में,
सवेरे और शाम की सतरँगी किरणों में
तुम्हें याद करूँगा ।
जब मेरे हाथ-पाँव अशक्त होकर
पथ के दावेदार नहीं रहेंगे
रास्तों में घाटी पर उतरेगी शाम की पकी धूप
जब सवेरे और शाम की रोशनी मेरे लिए एक जैसी होगी
आँखें देख नहीं पाएँगी तुम्हारा हरी फ़सल-रूप
तुम्हें याद करूँगा ।
जिस तरह नदी के बहाव के नीचे
बहुत सारे अन्तर-प्रश्न छिपे होते हैं
बालू की सतह के नीचे पानी
और पत्थर के दिल में करुणा स्रोत फूटते हैं
मेरे दिल में
यादों का वसन्त फूलेगा
बार-बार लिखूँगा नई पत्तियों के मस्तक पर
तुम्हें याद करता रहूँगा ।
(आभार- एक बात मैं और बताना चाहूँगा कि अपनी ब्लॉग पोस्ट्स में मैं जो कविताएं, ग़ज़लें, शेर आदि शेयर करता हूँ उनको मैं सामान्यतः ऑनलाइन उपलब्ध ‘कविता कोश’ अथवा ‘Rekhta’ से लेता हूँ|)
आज के लिए इतना ही,
नमस्कार|
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