अज्ञेय जी द्वारा संपादित सप्तकों के कवियों की कविताएं और उसमें से चौथा सप्तक के कवियों की रचनाएं शेयर करने के क्रम में आज मैं श्री राजकुमार कुंभज जी की एक कविता शेयर कर रहा हूँ|
इनकी शायद एक ही रचना मैंने पहले शेयर की है|
लीजिए आज प्रस्तुत है श्री राजकुमार कुंभज जी की यह कविता –

एक दिन एक विचार आया
कि कैसे होता है परमात्मा देखा जाए
मैंने देखी एक गर्भवती स्त्री
और मैं अनूठे रोमांच से भर गया यकीनन
मैंने देखी एक अधखिली कली
और मैं अनूठे रोमांच से भर गया यकीनन
मैंने देखी एक पकती रोटी
और मैं अनूठे रोमांच से भर गया यकीनन
एक दिन एक विचर आया
कि अगर मैं विचार करना बंद कर दूँ तो क्या होगा?
कहा उस एक लड़की ने जो दूर खड़ी खिलखिला रही थी
बुद्धुराम कुछ नहीं होगा।
(आभार- एक बात मैं और बताना चाहूँगा कि अपनी ब्लॉग पोस्ट्स में मैं जो कविताएं, ग़ज़लें, शेर आदि शेयर करता हूँ उनको मैं सामान्यतः ऑनलाइन उपलब्ध ‘कविता कोश’ अथवा ‘Rekhta’ से लेता हूँ|)
आज के लिए इतना ही,
नमस्कार|
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