लक्ष्य वेध!

अज्ञेय जी द्वारा संपादित तीसरा सप्तक के कवियों की रचनाएं शेयर करने के क्रम में आज मैं स्वर्गीय प्रयाग नारायण त्रिपाठी जी की  एक कविता शेयर कर रहा हूँ|

इनकी  रचनाएं मैंने पहले शेयर नहीं की हैं|

लीजिए आज प्रस्तुत है स्वर्गीय प्रयाग नारायण त्रिपाठी जी की यह कविता –

आँखें लीं मींच
और खींच ली कमान
और छोड़ दिया शब्द-वेधी बाण
लक्ष्य बिंध गया।
ओ रे ओ अहेरी!


दृष्टि आभ्यंतर तेरी
कैसे इस अदृष्ट बिंदु
इस लक्ष्य पर पड़ गई?
मात्र एक क्षण को कुछ सिहरन हुई थी
ध्वनि झंकृत हुई थी उसी क्षण की
मर्म-थल में
तक कर उसे ही तू ने
तन कर जतन से
कान तक तान एक तीक्ष्ण तीर
छोड़ दिया
अब इस लक्ष्य वेदना के निरुवारन का
कोई तो सुगम उपचार समझाता जा,
अथवा इसे झेलने का
सहज सह जाने का
ओ रे दुर्निवार!
कोई भेद ही बताता जा!

(आभार- एक बात मैं और बताना चाहूँगा कि अपनी ब्लॉग पोस्ट्स में मैं जो कविताएं, ग़ज़लें, शेर आदि शेयर करता हूँ उनको मैं सामान्यतः ऑनलाइन उपलब्ध ‘कविता कोश’ अथवा ‘Rekhta’ से लेता हूँ|)

आज के लिए इतना ही,

नमस्कार| 

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2 responses to “लक्ष्य वेध!”

  1. नमस्कार 🙏🏻

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    1. नमस्कार जी

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