करो सहन!

अज्ञेय जी द्वारा संपादित दूसरा सप्तक के कवियों की रचनाएं शेयर करने के   क्रम में आज स्वर्गीय रघुवीर सहाय जी की एक और कविता शेयर कर रहा हूँ| रघुवीर सहाय जी प्रतिष्ठित समाचार पत्रिका ‘दिनमान’ के संपादक के रूप में भी विख्यात हुए थे|

रघुवीर सहाय जी की कुछ रचनाएं मैंने पहले भी शेयर की हैं|

लीजिए आज प्रस्तुत है स्वर्गीय रघुवीर सहाय जी की यह कविता –

कष्ट गहन
करो सहन,
ओ रे मन ।

नहीं, नहीं, व्यथा में है सुख नहीं कोई व्यथा ही का
यह न समझ गौरव है दुख में, दुख की कथा ही का ।
सुने कौन ?
सभी निजी विरह व्यथा में मौन ।
मत कहो, सहो, सहो, सहो, रहो कि अभी है अस्पष्ट
क्या देता है कष्ट । करो वहन
माथे पर दिल का भार
जब तक प्रतिकार न हो, सहो, सहो
जब तक यह न हो बोध
मुझ में भी क्रोध
और लूँगा प्रतिशोध । और जब तक प्रतिशोध न हो
कष्ट गहन,
करो सहन,
ओ रे मन ।

(आभार- एक बात मैं और बताना चाहूँगा कि अपनी ब्लॉग पोस्ट्स में मैं जो कविताएं, ग़ज़लें, शेर आदि शेयर करता हूँ उनको मैं सामान्यतः ऑनलाइन उपलब्ध ‘कविता कोश’ अथवा ‘Rekhta’ से लेता हूँ|)

आज के लिए इतना ही,

नमस्कार| 

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2 responses to “करो सहन!”

  1. नमस्कार 🙏🏻

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    1. नमस्कार जी

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