आज से मैं, अज्ञेय जी द्वारा संपादित दूसरा सप्तक के कवियों की रचनाएं शेयर करना प्रारंभ कर रहा हूँ और इस क्रम में सबसे पहले मैं स्वर्गीय भवानी प्रसाद मिश्र जी की एक और कविता शेयर कर रहा हूँ|
भवानी दादा की बहुत सी रचनाएं मैंने पहले भी शेयर की हैं|
लीजिए आज प्रस्तुत है स्वर्गीय भवानी प्रसाद मिश्र जी की यह कविता –

दूसरे सारे पंछी
अपने सारे गीत
गा चुके हैं
रक्त और नील
सारे फूल
मेरे आँगन में आ चुके हैं
सुनाई नहीं दी
एक तुम्हारी ही बोली
ओ पीताभ किरण पंछी
ओ ठीक कविता की सहोदरा
फूल और गीत और धरा
सब जैसे धाराहत हैं इस घटना से
अनुक्षण रत हैं सब
तुम्हारी
प्रतीक्षा में !
(आभार- एक बात मैं और बताना चाहूँगा कि अपनी ब्लॉग पोस्ट्स में मैं जो कविताएं, ग़ज़लें, शेर आदि शेयर करता हूँ उनको मैं सामान्यतः ऑनलाइन उपलब्ध ‘कविता कोश’ अथवा ‘Rekhta’ से लेता हूँ|)
आज के लिए इतना ही,
नमस्कार|
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