ओ मेरे विशेषण!

आज एक बार फिर से मैं, हिन्दी के श्रेष्ठ रचनाकार तथा अज्ञेय जी द्वारा संपादित प्रमुख काव्य संकलन ‘तारसप्तक’ में भी शामिल कवि स्वर्गीय भारत भूषण अग्रवाल जी की एक रचना शेयर कर रहा हूँ|

इनकी कुछ रचनाएं मैंने पहले भी शेयर की हैं|

लीजिए आज प्रस्तुत है स्वर्गीय भारत भूषण अग्रवाल जी की यह कविता –

हर विशेषण विशेष्य को कमज़ोर करता है
क्योंकि वह उसे अपना मुहताज बना लेता है
इसीलिए तो, मेरे विशेषण !
तुम मुझसे जीत गए हो
इसीलिए तो तुम हर बार मुँह फ़ाड़ कर हँसते हो
जब मैं तुमसे अपना सिर टकराता हूँ ।
कितनी बड़ी मूर्खता थी यह सोचना कि तुम्हारे बिना मैं कुछ नहीं हूँ
जब कि मैं जो कुछ हूँ, हो सकता हूँ, या होऊँगा
वह उतना ही जितना तुम्हारे बिना हूँ ।
तुम मैं नहीं हो यह ठीक है
तो फिर तुम हो ही क्या
महज़ एक डर, एक संकोच, एक आदत
जिससे मैं चाहे छूट न भी पाऊँ
पर जो मैं नहीं हूँ ।

(आभार- एक बात मैं और बताना चाहूँगा कि अपनी ब्लॉग पोस्ट्स में मैं जो कविताएं, ग़ज़लें, शेर आदि शेयर करता हूँ उनको मैं सामान्यतः ऑनलाइन उपलब्ध ‘कविता कोश’ अथवा ‘Rekhta’ से लेता हूँ|)

आज के लिए इतना ही,

नमस्कार| 

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4 responses to “ओ मेरे विशेषण!”

  1. वाह विशेषण तुम्हारा यह अन्वेषण
    हिन्दी साहित्य का बना शुभ शेषण

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  2. हार्दिक धन्यवाद जी

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  3. लोगों, चीज़ों और स्थानों के सभी विवरण दुनिया में अपना रास्ता खोजने का एक प्रयास हैं।
    कार्यों या स्थितियों का वर्णन स्वयं से या बाहरी दुनिया से दूरी पैदा कर सकता है।
    इसीलिए मैं अचेतन में अपने, आपके और संसार के बारे में सत्य की खोज में निकल रहा हूँ।
    आप अपने विशेषणों से मुझे आश्वस्त नहीं कर सके।
    भले ही आपकी विडंबना, मेरे विश्वदृष्टिकोण पर आपकी हंसी मुझे प्रभावित करती है।
    मैं अपना सिर दीवार से नहीं टकराऊंगा.
    मैं तुमसे जुड़ा हूं; मैं मैं ही रहता हूँ.
    मैं भविष्य को अस्पष्ट रूप से जानता हूं।
    मृत्यु एक पूर्ण सत्य है.
    मैं अपने डर, अपनी झिझक, अपनी आदतों का सामना आत्मा के दर्पण में सपने के माध्यम से कर सकता हूँ और नई अंतर्दृष्टि प्राप्त कर सकता हूँ।

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