क्या बात करें?

आज एक बार फिर से मैं, हिन्दी के श्रेष्ठ नवगीतकार श्री बुद्धिनाथ मिश्र जी की एक रचना शेयर कर रहा हूँ|

इनकी कुछ रचनाएं मैंने पहले भी शेयर की हैं|

लीजिए आज प्रस्तुत है श्री बुद्धिनाथ मिश्र जी का यह नवगीत –

घर की बात करें वे जो घर वाले हैं
हम फुटपाथों पर बैठे क्या बात करें?

रोज़-रोज़ सूरज का गुस्सा झेलें हम
आँधी-पानी, ठंड, आग से खेलें हम
बिगड़ी हुई हवा हो या दानी बादल
सबने हमें उजाड़ा, साक्षी गंगाजल

मौसम जिनकी मुट्ठी में, वे ख़ुश हो लें
हम मौसम की फिकरों की क्या बात करें?

काश की अपने आँगन सूर्यमुखी खिलता
एक अदद बिस्तरा थके तन को मिलता
पाँव तले निज धरती, सिर पर छत होती
सड़क किनारे चिथड़ों की झुग्गी डाले
लोग बया के खोतों की क्या बात करें?

यह दुनिया है ज़िन्दा लाशों की दुनिया
सीलन, बदबू, मौत, तमाशों की दुनिया
निगल गई योजना-नदी की बाढ़ जिसे
उस बस्ती के अजब, अनूठे हैं किस्से

ठाँव जिन्हें मिल सका नहीं नरकों में भी
वे सपने नव स्वर्गों की क्या बात करें?

(आभार- एक बात मैं और बताना चाहूँगा कि अपनी ब्लॉग पोस्ट्स में मैं जो कविताएं, ग़ज़लें, शेर आदि शेयर करता हूँ उनको मैं सामान्यतः ऑनलाइन उपलब्ध ‘कविता कोश’ अथवा ‘Rekhta’ से लेता हूँ|)

आज के लिए इतना ही,

नमस्कार| 

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3 responses to “क्या बात करें?”

  1. नमस्कार 🙏🏻

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    1. नमस्कार जी

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  2. स्वयं
    वो आत्मा
    हमें पता चलता है
    सपने में
    अपनी ही बुराई के बारे में
    वह स्वेच्छा से
    या बस ऐसे ही
    हमारे हाथ के ऊपर
    इस बारे में कि हम कैसे बात करते हैं
    दुनिया
    और जीवन
    ब्रांडेड

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