इसी तट पर!

आज एक बार फिर से मैं, हिन्दी नवगीत की वरिष्ठ कवियित्री सुश्री शांति सुमन जी की एक रचना शेयर कर रहा हूँ|

इनकी कुछ रचनाएं मैंने पहले भी शेयर की हैं|

लीजिए आज प्रस्तुत है सुश्री शांति सुमन जी की यह कविता –

अपरिचय का आकाश तोड़ें
एक लंबा अतराल जोड़ें

कहाँ बहुत मिलते हैं, फुरसत के दिन
फंसे हैं किताबों में तितली के पिन
पिछले छूटे सवाल कोड़ें

धूप-हवा-बिजली सी लगती बातें
पदमावत की कथा सी जगती रातें
दुखते सारे मिसाल छोड़ें

अंकुर की प्यास लिए हरियाये खेत
कहीं दूर फेंकें ये ओसायी रेत
दिशाएं तरंगों की मोड़ें

(आभार- एक बात मैं और बताना चाहूँगा कि अपनी ब्लॉग पोस्ट्स में मैं जो कविताएं, ग़ज़लें, शेर आदि शेयर करता हूँ उनको मैं सामान्यतः ऑनलाइन उपलब्ध ‘कविता कोश’ अथवा ‘Rekhta’ से लेता हूँ|)

आज के लिए इतना ही,

नमस्कार| 

                                         ********

2 responses to “इसी तट पर!”

  1. नमस्कार 🙏🏻

    Liked by 2 people

    1. नमस्कार जी

      Like

Leave a reply to samaysakshi Cancel reply