उसकी खिड़की खुली है!

आज एक बार फिर से मैं, हिन्दी के प्रसिद्ध आधुनिक कवि श्री अशोक वाजपेयी  जी की एक रचना शेयर कर रहा हूँ|

अशोक वाजपेयी  जी की बहुत सी रचनाएं मैंने पहले भी शेयर की हैं|

लीजिए आज प्रस्तुत है श्री अशोक वाजपेयी जी की यह कविता –

उसकी खिड़की खुली है,
उसके आँगन में गूँज रहा है दुख,
उसके दरवाज़े लाचार खड़ा है प्रेम।

उसकी सुन्दरता ने बनाया है घर,
उसकी चाहत ने डाला है छप्पर,
उसकी उदासी ने खींचे हैं परदे।

वह कुछ कहती नहीं है
पर उसकी आँखों में डबडबाते हैं शब्द,
उसके इशारों में डूबते-उतराते हैं नक्षत्र,
वह आकाश में कौंधती है बिजली की तरह,
वह उगती है वृक्ष की तरह पृथ्वी पर।

वह चाय बनाती है,
रोटी सेंकती है,
सब्ज़ियाँ खरीदने बाज़ार जाती है,
वह मन्दिर में प्रार्थना बुदबुदाती है।
वह दस्तक देती है…
अन्दर जाती है,
धूप में बाल सुखाने छज्जे पर आती है :
वह जीती है
पोर-पोर पग-पग।

(आभार- एक बात मैं और बताना चाहूँगा कि अपनी ब्लॉग पोस्ट्स में मैं जो कविताएं, ग़ज़लें, शेर आदि शेयर करता हूँ उनको मैं सामान्यतः ऑनलाइन उपलब्ध ‘कविता कोश’ अथवा ‘Rekhta’ से लेता हूँ|)

आज के लिए इतना ही,

नमस्कार| 

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5 responses to “उसकी खिड़की खुली है!”

  1. christinenovalarue avatar
    christinenovalarue

    🖤

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  2. वो आत्मा
    एक प्रकाश फेंकता है
    युवा खूबसूरत महिला पर
    उसकी नीली आँखें जल रही हैं
    वर्षों बाद भी
    प्रेम की खातिर
    बिना उत्तर के
    चुंबन पर
    इंतज़ार किया
    शाम को झील के तट पर

    Liked by 2 people

  3. नमस्कार 🙏🏻

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    1. नमस्कार जी

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