आज एक बार फिर से मैं, हिन्दी साहित्य की सभी विधाओं में अपना श्रेष्ठ योगदान करने वाले कवि स्वर्गीय सच्चिदानंद हीरानंद वात्स्यायन अज्ञेय जी की एक रचना शेयर कर रहा हूँ| अज्ञेय जी की एक प्रमुख उपलब्धि यह भी थी कि उन्होंने उस समय के श्रेष्ठ कवियों को तारसप्तक तथा तीन सप्तकों के माध्यम से पाठकों के सम्मुख लाए थे|
अज्ञेय जी की कुछ रचनाएं मैंने पहले भी शेयर की हैं|
लीजिए आज प्रस्तुत है स्वर्गीय सच्चिदानंद हीरानंद वात्स्यायन अज्ञेय जी की यह कविता –

आज तुम से मिल सकूँगा, था मुझे विश्वास!
आज जब कि बबूल पर भी सिरिस-कोमल बौर पलता-
मंजरी की प्यालियों में ओस का मधु-दौर चलता;
खेलती थी विजन में सुरभि मलय की साँस।
उर भरे उल्लास।
प्यार के उन्माद से भर, पंडुकी भी स्वर बदल कर,
सघन पीपल-डाल पर से थी बुलाती प्रणय-सहचर-
छा रहा सब ओर था अनुराग का कलहास।
वह मिलन की प्यास!
कल- झुलसते सुमन-जग में वेदना की हूक होगी,
निरस, श्री-हत तरु-शिखर पर मूक कोकिल-कूक होगी!
खर-निदाघ-ज्वाल में जल जाएगा मधुमास।
झूठ कल ही आस!
कल- जवानी की उमंगें बिखर होंगी धूल जग में-
आज की यह कामना ही चुभेगी बन शूल मग में!
भुवन-भर को माप लेगा काल-डग का व्यास।
प्रलय का आभास!
दूर तुम- हा, दूर तुम- अवसान आया पास,
आज प्रत्यय भी पराजित- मैं नियति का दास!
आज तुम से मिल सकूँगा था मुझे विश्वास।
(आभार- एक बात मैं और बताना चाहूँगा कि अपनी ब्लॉग पोस्ट्स में मैं जो कविताएं, ग़ज़लें, शेर आदि शेयर करता हूँ उनको मैं सामान्यतः ऑनलाइन उपलब्ध ‘कविता कोश’ अथवा ‘Rekhta’ से लेता हूँ|)
आज के लिए इतना ही,
नमस्कार|
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