उतरे नहीं ताल पर पंछी! 

आज एक बार फिर से मैं, हिन्दी के एक श्रेष्ठ कवि स्वर्गीय कैलाश गौतम जी की एक रचना शेयर कर रहा हूँ| कैलाश जी मुख्य रूप से हास्य-व्यंग्य की कविताओं के लिए जाने जाते थे परंतु वे नवगीत भी लिखते थे|

गौतम जी की बहुत सी रचनाएं मैंने पहले भी शेयर की हैं|

लीजिए आज प्रस्तुत है स्वर्गीय कैलाश गौतम जी का यह नवगीत –

उतरे नहीं ताल पर पंछी
बादल नहीं घिरे
हम बंजारे
मारे-मारे
दिन भर आज फिरे ।

गीत न फूटा
हँसी न लौटी
सब कुछ मौन रहा,
पगडंडी पर आगे-आगे
जाने कौन रहा
हवा न डोली
छाँह न बोली
ऐसे मोड़ मिले ।

आर-पार का न्योता देकर
मौसम चला गया
हिरन अभागा उसी रेत में
फिर-फिर छला गया
प्यासे ही रह गए
हमारे
पाटल नहीं खिले ।

मन दो टूक हुआ है
सपने
चकनाचूर हुए
जितनी दूर नहीं सोचे थे
उतनी दूर हुए
रात गए
आँगन में सौ-सौ
तारे टूट गिरे ।

(आभार- एक बात मैं और बताना चाहूँगा कि अपनी ब्लॉग पोस्ट्स में मैं जो कविताएं, ग़ज़लें, शेर आदि शेयर करता हूँ उनको मैं सामान्यतः ऑनलाइन उपलब्ध ‘कविता कोश’ अथवा ‘Rekhta’ से लेता हूँ|)

आज के लिए इतना ही,

नमस्कार| 

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3 responses to “उतरे नहीं ताल पर पंछी! ”

  1. christinenovalarue avatar
    christinenovalarue

    🩵

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  2. नमस्कार 🙏🏻

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    1. नमस्कार जी

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