आज एक बार फिर से मैं, अपने समय में हिन्दी काव्य मंचों पर अपने गीतों के माध्यम से धूम मचाने वाले स्वर्गीय बलबीर सिंह ‘रंग’ जी की एक रचना शेयर कर रहा हूँ|
रंग जी की बहुत सी रचनाएं मैंने पहले भी शेयर की हैं|
लीजिए आज प्रस्तुत है स्वर्गीय बलबीर सिंह ‘रंग’ जी का यह गीत –

कहिए, हम क्या-क्या लिखें?
शब्दों के जाल बुनें,
कागज के फूल चुनें;
रचना से अधिक ध्यान शीर्षक का रखें?
कहिए…
अनुवादित कथ्य कहें,
तथ्यों से दूर रहें;
कड़वे को थूकें और मधुर-मधुर चखें?
कहिए…
गत का रथ लौट गया,
सब कुछ है नया-नया;
शीश महल में कब तक एकाकी दिखें?
कहिए…
(आभार- एक बात मैं और बताना चाहूँगा कि अपनी ब्लॉग पोस्ट्स में मैं जो कविताएं, ग़ज़लें, शेर आदि शेयर करता हूँ उनको मैं सामान्यतः ऑनलाइन उपलब्ध ‘कविता कोश’ अथवा ‘Rekhta’ से लेता हूँ|)
आज के लिए इतना ही,
नमस्कार|
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