आज एक बार फिर से मैं हिन्दी नवगीत के अनूठे हस्ताक्षर स्वर्गीय रमेश रंजक जी की एक रचना शेयर कर रहा हूँ|
रंजक जी की बहुत सी रचनाएं मैंने पहले भी शेयर की हैं|
लीजिए आज प्रस्तुत है स्वर्गीय रमेश रंजक जी का यह नवगीत –

पोर-पोर में दर्द निमोही
एक गीत में बाँधूँ कैसे ?
अपराधी बचपन की सज़ा मिली यौवन को
दया न आई तेरे न्यायाधीश नयन को
बोलो ! वर्तमान के आँसू
अब अतीत में बाँधूँ कैसे ?
अब तो लगता है हर दिन दर्द का जन्म-दिन
हँसी फूल की चुभती है जिस तरह आलपिन
घायल अन्तर का सूनापन
हार-जीत में बाँधूँ कैसे ?
(आभार- एक बात मैं और बताना चाहूँगा कि अपनी ब्लॉग पोस्ट्स में मैं जो कविताएं, ग़ज़लें, शेर आदि शेयर करता हूँ उनको मैं सामान्यतः ऑनलाइन उपलब्ध ‘कविता कोश’ अथवा ‘Rekhta’ से लेता हूँ|)
आज के लिए इतना ही,
नमस्कार|
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