मुझको क्या-क्या नहीं मिला! 

आज एक बार फिर से मैं हिन्दी नवगीत के शिखर पुरुष स्वर्गीय शंभुनाथ सिंह जी की एक रचना शेयर कर रहा हूँ|

शंभुनाथ जी की बहुत सी रचनाएं मैंने पहले भी शेयर की हैं|

लीजिए आज प्रस्तुत है स्वर्गीय शंभुनाथ सिंह जी का यह नवगीत –

राजा से हाथी घोड़े
रानी से सोने के बाल,
मुझको क्या-क्या नहीं मिला
मन ने सब-कुछ रखा संभाल।


चँदा से हिरनों का रथ
सूरज से रेशमी लगाम,
पूरब से उड़नखटोले
पश्चिम से परियाँ गुमनाम।
रातों से चाँदी की नाव
दिन से मछुए वाला जाल!


बादल से झरती रुन-झुन
बिजली से उड़ते कंगन,
पुरवा से सन्दली महक
पछुवा से देह की छुवन।
सुबहों से जुड़े हुए हाथ
शामों से हिलती रूमाल!


नभ से अनदेखी ज़ंजीर
धरती से कसते बन्धन,
यौवन से गर्म सलाखें
जीवन से अनमाँगा रण।
पुरखों से टूटी तलवार
बरसों से ज़ंग लगी ढाल!


गलियों से मुर्दों की गंध
सड़कों से प्रेत का कुआँ,
घर से दानव का पिंजड़ा
द्वार से मसान का धुआँ!
खिड़की से गूँगे उत्तर
देहरी से चीख़ते सवाल!
मुझको क्या-क्या नहीं मिला
मन मे सब-कुछ रखा संभाल!

(आभार- एक बात मैं और बताना चाहूँगा कि अपनी ब्लॉग पोस्ट्स में मैं जो कविताएं, ग़ज़लें, शेर आदि शेयर करता हूँ उनको मैं सामान्यतः ऑनलाइन उपलब्ध ‘कविता कोश’ अथवा ‘Rekhta’ से लेता हूँ|)

आज के लिए इतना ही,

नमस्कार| 

                                         ********

2 responses to “मुझको क्या-क्या नहीं मिला! ”

  1. नमस्कार 🙏🏻

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    1. नमस्कार जी

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