आज एक बार फिर से मैं हिन्दी के अनूठे कवि स्वर्गीय भवानी प्रसाद मिश्र जी की एक रचना शेयर कर रहा हूँ| भवानी दादा बातचीत के अंदाज़ में बहुत गहरी बात कह जाते थे|
भवानी दादा की बहुत सी रचनाएं मैंने पहले भी शेयर की हैं|
लीजिए आज प्रस्तुत है स्वर्गीय भवानी प्रसाद मिश्र जी की यह कविता –

मेरा लहरों पर डेरा
तुमने तट से मुझे
धरती पर क्यों टेरा
दो मुझे अब मुझे
वहाँ भी वैसी
उथल-पुथल की ज़िन्दगी
आदत जो हो गई है
डूबने उतराने की
तूफ़ानों में गाने की
लाओ धरो मेरे सामने
वैसी उथल-पुथल की ज़िन्दगी
और तब कहो आओ
मेरा लहरों पर डेरा
तुमने मुझे तट से
धरती पर क्यों टेरा !
(आभार- एक बात मैं और बताना चाहूँगा कि अपनी ब्लॉग पोस्ट्स में मैं जो कविताएं, ग़ज़लें, शेर आदि शेयर करता हूँ उनको मैं सामान्यतः ऑनलाइन उपलब्ध ‘कविता कोश’ अथवा ‘Rekhta’ से लेता हूँ|)
आज के लिए इतना ही,
नमस्कार|
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