क्या किया आज तक क्या पाया!

आज पहली बार मैं हिन्दी के प्रमुख व्यंग्यकार स्वर्गीय हरिशंकर परसाई जी की एक कविता शेयर कर रहा हूँ|

परसाई जी ने शायद कुछ ही कविताएं लिखी हैं, जिनमें से एक मैं शेयर कर रहा हूँ|

लीजिए आज प्रस्तुत है स्वर्गीय हरिशंकर परसाई जी की यह कविता –

मैं सोच रहा, सिर पर अपार
दिन, मास, वर्ष का धरे भार
पल, प्रतिपल का अंबार लगा
आखिर पाया तो क्या पाया?

जब तान छिड़ी, मैं बोल उठा
जब थाप पड़ी, पग डोल उठा
औरों के स्वर में स्वर भर कर
अब तक गाया तो क्या गाया?

सब लुटा विश्व को रंक हुआ
रीता तब मेरा अंक हुआ
दाता से फिर याचक बनकर
कण-कण पाया तो क्या पाया?

जिस ओर उठी अंगुली जग की
उस ओर मुड़ी गति भी पग की
जग के अंचल से बंधा हुआ
खिंचता आया तो क्या आया?

जो वर्तमान ने उगल दिया
उसको भविष्य ने निगल लिया
है ज्ञान, सत्य ही श्रेष्ठ किंतु
जूठन खाया तो क्या खाया?

 (आभार- एक बात मैं और बताना चाहूँगा कि अपनी ब्लॉग पोस्ट्स में मैं जो कविताएं, ग़ज़लें, शेर आदि शेयर करता हूँ उनको मैं सामान्यतः ऑनलाइन उपलब्ध ‘कविता कोश’ अथवा ‘Rekhta’ से लेता हूँ|)

आज के लिए इतना ही,

नमस्कार|                                         

                                      ********  

4 responses to “क्या किया आज तक क्या पाया!”

  1. नमस्कार 🙏🏻

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    1. नमस्कार जी

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