मेरी मूक पुकार!

आज एक बार फिर मैं हिन्दी साहित्य की सभी विधाओं में अपना अमूल्य योगदान करने वाले अपने समय के प्रमुख कवि स्वर्गीय सच्चिदानंद हीरानंद वात्स्यायन अज्ञेय जी की एक कविता शेयर कर रहा हूँ|

अज्ञेय जी की कुछ रचनाएँ मैं पहले भी शेयर कर चुका हूँ|

लीजिए आज प्रस्तुत है स्वर्गीय सच्चिदानंद हीरानंद वात्स्यायन अज्ञेय जी की यह कविता –

विश्व-नगर नगर में कौन सुनेगा मेरी मूक पुकार-
रिक्ति-भरे एकाकी उर की तड़प रही झंकार-
‘अपरिचित! करूँ तुम्हें क्या प्यार?’
नहीं जानता हूँ मैं तुम को, नहीं माँगता कुछ प्रतिदान;
मुझे लुटा भर देना है, अपना अनिवार्य, असंयत गान।
ओ अबाध के सखा! नहीं मैं अपनाने का इच्छुक हूँ;
अभिलाषा कुछ नहीं मुझे, मैं देने वाला भिक्षुक हूँ!
परिचय, परिणय के बन्धन से भी घेरूँ मैं तुम को क्यों?
सृष्टि-मात्र के वाञ्छनीय सुख! मेरे भर हो जाओ क्यों?
प्रेमी-प्रिय का तो सम्बन्ध स्वयं है अपना विच्छेदी-
भरी हुई अंजलि मैं हूँ, तुम विश्व-देवता की वेदी!
अनिर्णीत! अज्ञात! तुम्हें मैं टेर रहा हूँ बारम्बार-
मेरे बद्ध हृदय में भरा हुआ है युगों-युगों का भार।
सीमा में मत बँधो, न तुम खोलो अनन्त का माया-द्वार-
मैं जिज्ञासु इसी का हूँ कि अपरिचित! करूँ तुम्हें क्या प्यार?
विश्व नगर में कौन सुनेगा मेरी मूक पुकार-
रिक्ति-भरे एकाकी उर की तड़प रही झंकार-
‘अपरिचित! करूँ तुम्हें क्या प्यार?’

 (आभार- एक बात मैं और बताना चाहूँगा कि अपनी ब्लॉग पोस्ट्स में मैं जो कविताएं, ग़ज़लें, शेर आदि शेयर करता हूँ उनको मैं सामान्यतः ऑनलाइन उपलब्ध ‘कविता कोश’ अथवा ‘Rekhta’ से लेता हूँ|)

आज के लिए इतना ही,

नमस्कार|                                         

                                        ********  

3 responses to “मेरी मूक पुकार!”

  1. नमस्कार 🙏🏻

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    1. नमस्कार जी

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  2. करबद्ध एवं विनयावनत एक दुस्साहस कर रहा हूँ , कविता का जवाब देने का :

    आकाश से गूंथी रौशनी, तेरे गीत में छुपा एक सार,
    सुना तो , पर तनिक फिर से कहना,
    “अपरिचित! करूँ तुम्हें क्या प्यार?”

    रातें प्रातः से मिलकर, हैरानी से भरा हर तार,
    कहो तो सही, दुबारा
    “अपरिचित! करूँ तुम्हें क्या प्यार?”

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