आज एक बार फिर मैं राजस्थान के विख्यात कवि स्वर्गीय हरीश भादानी जी की एक कविता शेयर कर रहा हूँ| भादानी जी ने राजस्थानी और खड़ी बोली दोनों में अपनी श्रेष्ठ रचनाओं के माध्यम से योगदान किया है|
भादानी जी की कुछ रचनाएँ मैं पहले भी शेयर कर चुका हूँ|
लीजिए आज प्रस्तुत है स्वर्गीय हरीश भादानी जी की यह कविता –

ड्योढ़ी रोज शहर फिर आए
कुनमुनते ताम्बे की सुइयां
खुभ-खुभ आंख उघाड़े
रात ठरी मटकी उलटा कर
ठठरी देह पखारे
बिना नाप के सिये तकाजे
सारा घर पहनाए
ड्योढ़ी रोज शहर फिर आए
सांसों की पंखी झलवाए
रूठी हुई अंगीठी
मनवा पिघल झरे आटे में
पतली कर दे पीठी
सिसकी सीटी भरे टिफिन में
बैरागी-सी जाए
ड्योढ़ी रोज शहर फिर आए
पहिये पांव उठाये सड़कें
होड़ लगाती भागे
ठण्डे दो-मालों चढ़ जाने
रखे नसैनी आगे
दोराहों-चौराहों मिलना
टकरा कर अलगाए
ड्योढ़ी रोज शहर फिर आए
सूरज रख जाए पिंजरे में
जीवट के कारीगर
घड़ा-बुना सब बांध धूप में
ले जाए बाजीगर
तन के ठेले पर राशन की
थकन उठा कर लाए
ड्योढ़ी रोज शहर फिर आए
(आभार- एक बात मैं और बताना चाहूँगा कि अपनी ब्लॉग पोस्ट्स में मैं जो कविताएं, ग़ज़लें, शेर आदि शेयर करता हूँ उनको मैं सामान्यतः ऑनलाइन उपलब्ध ‘कविता कोश’ अथवा ‘Rekhta’ से लेता हूँ|)
आज के लिए इतना ही,
नमस्कार|
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