शब्दों की पुकार!

आज एक बार फिर मैं हिन्दी के श्रेष्ठ कवि स्वर्गीय दुष्यंत कुमार जी की एक कविता शेयर कर रहा हूँ| दुष्यंत जी को आपातकाल में लिखी गई उनकी ग़ज़लों के संग्रह ‘साये में धूप’ के लिए विशेष रूप से खयाती मिली थी|

दुष्यंत जी की बहुत सी रचनाएँ मैं पहले भी शेयर कर चुका हूँ|

लीजिए आज प्रस्तुत है स्वर्गीय दुष्यंत कुमार जी की यह कविता –

एक बार फिर
हारी हुई शब्द-सेना ने
मेरी कविता को आवाज़ लगाई—
“ओ माँ! हमें सँवारो।

थके हुए हम
बिखरे-बिखरे क्षीण हो गए,
कई परत आ गईं धूल की,
धुँधला सा अस्तित्व पड़ गया,
संज्ञाएँ खो चुके…!

लेकिन फिर भी
अंश तुम्हारे ही हैं
तुमसे पृथक कहाँ हैं?
अलग-अलग अधरों में घुटते
अलग-अलग हम क्या हैं?
(कंकर, पत्थर, राजमार्ग पर!)
ठोकर खाते हुए जनों की
उम्र गुज़र जाएगी,
हसरत मर जाएगी यह—
‘काश हम किसी नींव में काम आ सके होते,
हम पर भी उठ पाती बड़ी इमारत।’

ओ कविता माँ!
लो हमको अब
किसी गीत में गूँथो
नश्वरता के तट से पार उतारो
और उबारो—
एकरूप शृंखलाबद्ध कर
अकर्मण्यता की दलदल से।
आत्मसात होने को तुममें
आतुर हैं हम
क्योंकि तुम्हीं वह नींव
इमारत की बुनियाद पड़ेगी जिस पर।

शब्द नामधारी
सारे के सारे युवक, प्रौढ़ औ’ बालक,
एक तुम्हारे इंगित की कर रहे प्रतीक्षा,
चाहे जिधर मोड़ दो
कोई उज़र नहीं है—
ऊँची-नीची राहों में
या उन गलियों में
जहाँ खुशी का गुज़र नहीं है—;
लेकिन मंज़िल तक पहुँचा दो, ओ कविता माँ!
किसी छंद में बाँध
विजय का कवच पिन्हा दो, ओ कविता माँ!

धूल-धूसरित
हम कि तुम्हारे ही बालक हैं
हमें निहारो!
अंक बिठाओ,
पंक्ति सजाओ, ओ कविता माँ!”

एक बार फिर
कुछ विश्वासों ने करवट ली,
सूने आँगन में कुछ स्वर शिशुओं से दौड़े,
जाग उठी चेतनता सोई;
होने लगे खड़े वे सारे आहत सपने
जिन्हें धरा पर बिछा गया था झोंका कोई!

 (आभार- एक बात मैं और बताना चाहूँगा कि अपनी ब्लॉग पोस्ट्स में मैं जो कविताएं, ग़ज़लें, शेर आदि शेयर करता हूँ उनको मैं सामान्यतः ऑनलाइन उपलब्ध ‘कविता कोश’ अथवा ‘Rekhta’ से लेता हूँ|)

आज के लिए इतना ही,

नमस्कार|                                                      

                 ********  

4 responses to “शब्दों की पुकार!”

  1. नमस्कार 🙏🏻

    Liked by 1 person

    1. नमस्कार जी

      Like

  2. जवाब नहीं

    Liked by 1 person

Leave a reply to Nageshwar singh Cancel reply