आज एक बार फिर मैं किसी जमाने में मंचों पर अपने गीतों से धूम मचाने वाले विख्यात कवि स्वर्गीय बलबीर सिंह रंग जी का एक गीत शेयर कर रहा हूँ|
रंग जी की कुछ रचनाएँ मैं पहले भी शेयर कर चुका हूँ|
लीजिए आज प्रस्तुत है स्वर्गीय बलबीर सिंह रंग जी का यह गीत –

शांत दृगों में धधक उठी फिर यहाँ क्रांति की ज्वाला ,
प्यासी धरती मांग उठी फिर हृदय-रक्त का प्याला .
समय स्वयं जपने बैठा फिर महा मृत्यु की माला,
इन्कलाब की बाट जोहता क्या अदना, क्या आला .
जनता के आवाहन पर नवयुग ने करवट फेरी .
फिर से गूंज उठी रणभेरी .
पूर्व आज स्वीकार कर उठा पश्चिम का रण-न्योता,
पराधीनता और स्वतंत्रता में कैसा समझौता ?
हमें राह से डिगा न सकते अरि के दमन सुधारे
आजादी या मौत यही बस दो प्रस्ताव हमारे .
शूर बांधते कफन शीश से, कायर करते देरी,
फिर से गूंज उठी रणभेरी .
(आभार- एक बात मैं और बताना चाहूँगा कि अपनी ब्लॉग पोस्ट्स में मैं जो कविताएं, ग़ज़लें, शेर आदि शेयर करता हूँ उनको मैं सामान्यतः ऑनलाइन उपलब्ध ‘कविता कोश’ अथवा ‘Rekhta’ से लेता हूँ|)
आज के लिए इतना ही,
नमस्कार|
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