आज एक बार फिर मैं हिन्दी साहित्य के एक महान सृजक, सभी विधाओं में अपना अमूल्य योगदान करने वाले स्वर्गीय सच्चिदानंद हीरानंद अज्ञेय जी की एक कविता शेयर कर रहा हूँ|
अज्ञेय जी की बहुत सी रचनाएँ मैं पहले भी शेयर कर चुका हूँ|
लीजिए आज प्रस्तुत है अज्ञेय जी की यह कविता –

आ जाना प्रिय आ जाना!
अपनी एक हँसी में मेरे आँसू लाख डुबा जाना!
हा हृत्तन्त्री का तार-तार, पीड़ा से झंकृत बार-बार-
कोमल निज नीहार-स्पर्श से उस की तड़प सुला जाना।
फैला वन में घन-अन्धकार, भूला मैं जाता पथ-प्रकार-
जीवन के उलझे बीहड़ में दीपक एक जला जाना।
सुख-दिन में होगी लोक-लाज, निशि में अवगुंठन कौन काज?
मेरी पीड़ा के घूँघट में अपना रूप दिखा जाना।
दिनकर-ज्वाला को दूँ प्रतीति? जग-जग, जल-जल काटी निशीथ!
ऊषा से पहले ही आ कर जीवन-दीप बुझा जाना।
प्रिय आ जाना!
(आभार- एक बात मैं और बताना चाहूँगा कि अपनी ब्लॉग पोस्ट्स में मैं जो कविताएं, ग़ज़लें, शेर आदि शेयर करता हूँ उनको मैं सामान्यतः ऑनलाइन उपलब्ध ‘कविता कोश’ अथवा ‘Rekhta’ से लेता हूँ|)
आज के लिए इतना ही,
नमस्कार|
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